मनक़बत बा मौक़ा उर्से सरकार साहिब उल इक़्तिदार सय्य्दना मुर्शिदना व मौलाना अश्शाह शैख़ मुती उर्रसूल अब्दुल मुक़्तदिर क़ादरी बदायूँनी क़ुद्दुस सिर्राहुल अज़ीज़
📅 04-09-2021 06:41 PM
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कविता
<p>फ़ैसल क़ादरी गुन्नौरी</p>
<p>मैं ग़ुलाम ए शैख़ हूँ , हैं मेरे शाहे मुक़्तदिररह्ती है हर दम ग़ुलामों पर निगाहे मुक़्तदिर</p>
<p>सर को सज्दे में झुका कर वस्ल ए हक़ को पा लियाकैसे कोई भूल जाये सज्दा गाहे मुक़्तदिर</p>
<p>उन के क़दमों में झुके शाहों के सर देखे गयेहोगी कितनी शान वली फिर कुलाहे मुक़्तदिर</p>
<p>आफ़त ए दुनिया का ख़तरा क्यूँ भला हम को रहेफ़ज़्ले रब से हम ने पायी है पनाहे मुक़्तदिर</p>
<p>राह ए हक़ काआज भी दुनिया को देती है पताहै वो राहे हक़ यक़ीनन जो है राहे मुक़्तदिर</p>
<p>मेरे वालिद भी इसी दरबार के आशिक़ रहेमैं ने भी पयी है विर्से में पनाहे मुक़्तदिर</p>
<p>वो दयार ग़ौस के फ़ैसल हुये मसनद नशींहै दयार ए ग़ौस ए आज़म बारगाहे मुक़्तदिर</p>
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