ग़ज़ल: मंज़ूर, दर्दे- इश्क़ का दिल पे असर तो हो
<p>मंज़ूर, दर्दे- इश्क़ का दिल पे असर तो होलेकिन इलाज के लिए इक चारागर तो हो</p>
<p>मरने का क्या है मैं अभी मर सकता हूँ, मगरकोई तो सोज़ ख़्वां हो कोई नोहा गर तो हो</p>
<p>मैं तेरे दिल से कैसे निकल जाऊँ ये बतारहने को मेरे पास कोई और घर तो हो</p>
<p>कर दूँगा अपने प्यार का इज़हार उस से मैंलेकिन ज़रा सी उस की तवज्जो इधर तो हो</p>
<p>वो ख़ुद को बेच देगा यक़ीनन मेरे लिएमेरी परेशां हाली की उस को ख़बर तो हो</p>
<p>तब ही तो मअना ख़ेज़ बनेगी सफ़र की धूपराहों में सायादार कोई इक शजर तो हो</p>
<p>दुनिया का कोई खौफ़ न रह जाएगा तुम्हेंपैदा दिलों में ख़ालिक़े- अकबर का डर तो हो</p>
<p>तब तो करूँ मैं इज्ज़ के पहलू पे उस से बातवो रिफ़अते- ग़ुरूरो- अना से उतर तो हो</p>
<p>ज़की तारिक़ बाराबंकवीसआदतगंज, बाराबंकी, यूपी</p>
Comments (1)
Ejaz ahamad 15 Oct 2026
लाजबाब ज़ी 🌹🌹
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