रमज़ान जा रहा है
📅 18-04-2023 11:54 PM
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कविता
<p>कविता: रमज़ान जा रहा हैकवि: नासिर मनेरीसंस्थापक व अध्यक्ष: मनेरी फाउंडेशन, इंडिया</p>
<p>ग़मगीन सब को कर के मेहमान जा रहा है।कर के उदास माह-ए-गुफरान जा रहा है।।</p>
<p>मस्जिद की रौनकें भी अब खत्म हो रही हैं।सदमा हज़ार देकर रमज़ान जा रहा है।।</p>
<p>रोजा नमाज़, सहरी, इफ्तारी व तरावीह।हमराह-ए-हर सआदत मेहमान जा रहा है।।</p>
<p>रहमत थी, मग़फ़िरत थी, और थी नजात-ए-नार।जिस माह में वो माह-ए-फैज़ान जा रहा है।।</p>
<p>जिस माह में जज़ा भी सत्तर गुना थी ज़्यादा।अफसोस अब वो माह-ए-गुफरान जा रहा है।।</p>
<p>रब की रज़ा का जिस में मिलता सुनहरा मौक़ा।हो कर जुदा वो माह-ए-रिज़वान जा रहा है।।</p>
<p>कैसे करे ये मेहमाँ "नासिर मनेरी" रुख़सत।है हाल तो बुरा अब रमज़ान जा रहा है।।</p>
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