नात-ए-पाक: भँवर में है फँसा मेरा सफीना पार हो जाए
📅 19-04-2022 03:25 PM
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कविता
<p>काविश-ए-फिक्र: नासिर मनेरी</p>
<p>मेरे सरकार मुझ पर भी करम इक बार हो जाएतड़पता हूँ पए दीदार अब दीदार हो जाए</p>
<p>मिरे ऐ ना-खुदा कश्ती लगा दो पार अब मेरीभँवर में है फँसा मेरा सफीना पार हो जाए</p>
<p>मुबारक अंदलीबो! तुम को तैबा के गुल-ओ-गुलशनमिरे हिस्से में बस तैबा का यारब ख़ार हो जाए</p>
<p>सफर में भी, हज़र में भी जो दे क़ुरबानियाँ यारो!भला रुतबा ज़रा देखो वो यार-ए-ग़ार हो जाए</p>
<p>जिसे मौला बनाएँ मोमिनों का बे-शुबा आक़ावो हो शेर-ए-खुदा वो हैदर-ए-कर्रार हो जाए</p>
<p>जो जाए दर पे उन के हो मुक़द्दर का सिकंदर वोजो उन के दर से फिर जाए ज़लील-ओ-ख़्वार हो जाए</p>
<p>भला 'नासिर मनेरी' कब तलक हो दूर रौज़े सेकरम हो जाए अब ये हाज़िर-ए-दरबार हो जाए</p>
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