ग़ज़ल: उस ने जब मेरी तरफ़ प्यार से फेंका पानी
📅 06-01-2022 02:31 PM
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कविता
<p>ज़की तारिक़ बाराबंकवीसआदतगंज,बाराबंकी, यूपी</p>
<p>छूते ही जिस्म को बन बैठा शरारा पानीउस ने जब मेरी तरफ़ प्यार से फेंका पानी</p>
<p>एक मुद्दत से वो, जो सूख चला था पानीग़म तेरा सुन के मेरी आँख से निकला पानी</p>
<p>ढालता जाता है ज़ौ रेज़ से मोती जानाँक़तरा क़तरा तेरे बालों से टपकता पानी</p>
<p>पूछो मत लाया है बरबादियाँ कैसी कैसीजब भी मर्यादा की दहलीज़ को लाँघा पानी</p>
<p>जिस की ख़ुनकी ने तेरा लम्स नवाज़ा था मुझेफिर कभी वैसा करम फ़रमा न बरसा पानी</p>
<p>ये सदा जीतता आया था ज़माने से मगरवास्ता जब पड़ा मुझ से तो है हारा पानी</p>
<p>जामे- कौसर के लिए भी तो ज़रूरी थी प्यासवरना मैं ऐड़ी रगड़ता ओर उबलता पानी</p>
<p>शिद्दते- दर्द की मंज़िल से गुज़र कर अक्सरहम ने देखा है "ज़की" आग का बनना पानी</p>
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